मंगलवार, 8 मार्च 2016

अब मुझे भी डर लग रहा है।


आज कल देश में जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय का मुद्दा गरमाया हुआ है। 9 फरवरी की रात को जब टीवी पर मैंने देखा की देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में कुछ छात्र जो वामपंथ से ताल्लुक रखते हैं वो अफज़ल गुरु के नाम की तख्तियां शान से गले में डाल कर उसका शहादत दिवस मना रहे थे और पूरा देश ये तस्वीरें टीवी पर देख रहा था। सुबह होते होते उन् नारों का एक एक शब्द घर घर पहुँच गया था। और हर देश वासी की एक ही आवाज़ थी देश की राजधानी में और संसद से चंद किलोमीटर की दुरी पर संसद हमले के गुनहगार का महिमामंडन करने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। वैसे तो किसी आतंकवादी को बेकसूर बताने की कोशिश कोई नयी नहीं है पहले भी हमारे नेता और कुछ पत्रकार षड्यंत्र के तहत ऐसा करते रहे हैं। पर इस बार तसवीरें और वीडियो सब कुछ बोल रहा था। और फिर उस कार्यक्रम को आयोजित करने वाले लोग २ दिन तक खुद टीवी की बहस में आकर अपने किये को सही ठहराने में लगे थे और चीख चीख कर अफज़ल गुरु की फाँसी को न्यायिक हत्या बता रहे थे । देशभक्त होने के नाते सबका मन व्यथित था पर मन में एक सुकून था की इस बार पूरा देश खास तौर से इस देश का बुद्धिजीवी वर्ग एक साथ होगा क्यूंकि सारे सबूत सामने थे और गुनहगार खुद टीवी में बैठ कर इस बात को कबूल भी कर रहे थे । देश में उठी आवाज़ से सरकार को एक्शन में आना पड़ा और कनहैया को गिरफ्तार किया गया। 12 फरवरी तक सब वैसा ही चल रहा था जैसा किसी भी अच्छे और सभ्य देश में होना चाहिए। पर वामपंथी पत्रकारों बड़ी बेशर्मी के साथ देशद्रोही नारे लगाने वाले छात्रों का साथ दिया और वीडियो को झूठा बताया जबकि किसी कोर्ट ने उस वीडियो को नकली नहीं कहा है । और तो और अख़बारों में लेख लिखकर देशद्रोह और राजद्रोह को एक करके बताया गया जिससे आम जनता को ये मुद्दा सरकार के खिलाफ एक विद्रोह जैसा लगने लगे। आम भारतीय आज इन अख़बारों के मालिकों और इन पत्रकारों के अहंकार से डर रहा है। आखिर जब पूरा देश एक आवाज़ से देशद्रोही नारे लगाने वालों को सजा की मांग कर रहा था तब भी इनमे इतनी हिम्मत कहाँ से आ गयी की ये लोग उनके समर्थन में खड़े हो गए। ऐसे तो एक दिन ऐसा नारा भी लग सकता है कि "कसाब हम शर्मिंदा हैं तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं" आखिर 26/11 के हमले को भी तो कुछ लोगों ने आरएसएस की तरफ मोड़ने की कोशिश की थी। कुछ साल इसी बात को ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते रहने से ऐसा हो सकता है की हम ये मान भी लें की शायद कसाब निर्दोष था। ऐसा ही बटला काण्ड में भी हुआ था जब इन्ही बुद्धिजीवियों ने ये भ्रम फैलाने की कोशिश की थी की शायद शहीद इंस्पेक्टर शर्मा को गोली पीछे से चली थी मतलब ये की किसी पुलिस वाले ने ही उनको गोली मार दी। ऐसे उदाहरण ना जाने कितने हैं। .याकूब मेमन के लिए तो आधी रात को कोर्ट के दरवाज़े तक खटखटाये गए थे। ये वो ही लोग हैं जो नक्सलवादियों का खुले आम समर्थन करते हैं और उनके हथियार उठाने को सही ठहराते है और उनके बचाव में ये तर्क देते हैं की वहां हमारे अर्धसैनिक बलों के जवान महिलाओं और बच्चों पर जुल्म कर रहे हैं। आप खुद सोचिये की कुछ आतंकवादियों के पक्ष में देश के इतने बड़े बड़े वकील कैसे खड़े हो जाते है ? इस देश का बड़े से बड़ा आदमी अपने किसी केस की एक पेशी के लिए भी इन् वकीलों को बुलाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। उनकी जितनी एक पेशी की फीस है उतना तो एक आम आदमी पुरे साल में भी नहीं कमाता होगा। बड़ा सवाल ये है कि ये लोग कौन हैं जो देश की आवाज़ के खिलाफ बिना डरे चल रहे हैं, आखिर कौन सी वो ताकतें हैं जो इनका समर्थन कर रही है। आज जब पूरा विश्व आतंकवाद के खिलाफ एक हो रहा है, जब खुद मुसलमानो का एक बड़ा वर्ग जिसमे खासतौर से भारतीय मुस्लमान इस आतंकवाद के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं ऐसे वक़्त में इन लोगों की ये हरकतें आतंकवादियों के हौसले बुलंद कर रही है और इस से देश की सुरक्षा भी खतरे में पड़ रही है। आम जनमानस को ये आवाज़ उठानी होगी और सरकार से जांच की मांग करनी होगी जिससे ये पता लगे की ऐसे लोगों के असली मददगार कौन हैं जिनकी शह पर ये लोग देश के खिलाफ जाने से भी नहीं डरते। एक आम भारतीय होने के नाते मुझे भी डर लग रहा है। क्यूंकि कोई देश तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक आतंकवाद जैसे विषय पर भी वो एक राय ना बना सके। और जब तक ये लोग हैं ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता। क्यूंकि ये लोग किसी आतंकवादी हमले के बाद २ दिन तक तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ते दिखते हैं और फिर यही पत्रकार जेल के बाहर उस आतंकवादी का साक्षात्कार लेने के लिए लाइन लगा कर खड़े हो जाते हैं और तो और कुछ तो उसके घर पर जाकर उसकी गरीबी पर लम्बे चौड़े भाषण देने लग जाते हैं और फिर बड़े बड़े वकील उसके केस लड़ने चले आते हैं । अगर हमें ये देश बचाना है तो इन लोगों के खिलाफ देश को सड़कों पर आना होगा नहीं तो ये अजीब सा डर हमारे अंदर गहरा होता चला जाएगा और इसका फायदा देश के दुश्मन उठाएंगे और फिर वही होगा जो हमें इतने सालों में आतंकवादी हमलों में झेला है। वैसे भी जो देश आतंकवाद जैसे मुद्दों पर एक नहीं हो सकता उसके लोग सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहते हैं। एक तरफ हमारे देश के प्रधानमंत्री दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ माहोल बनाने में लगे हैं और दूसरी तरफ हमारे देश में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी कुछ आतंकवादियों को हीरो बनाने में लगे हैं। सोचिये ऐसी हरकत करके ये लोग ना सिर्फ हमारे प्रधानमंत्री को बल्कि पुरे देश को दुनिया में हँसी का पात्र बना रहे हैं। और अगर ये ऐसा ही चलता रहा तो देश को महाशक्ति बनाना सपना ही रह जाएगा।

शनिवार, 13 जून 2015

अरविन्द केजरीवाल को एक खुला पत्र

श्री मान अरविन्द केजरीवाल जी 
मुख्यमन्त्री, दिल्ली सरकार 

विषय : आपको फ़ज़ीयत करवाना अच्छा तो नहीं लगता 
मैं भी दिल्ली का एक नागरिक हूँ। और दिल्ली में रोज़ हो रही राजनितिक उठा पठक से परेशान होकर आपको ये पत्र लिख रहा हूँ। जितना मैं अब तक समझ पाया हूँ वो सिर्फ और सिर्फ इतना है कि आपको या तो विवाद बनाने में मज़ा आता है या फिर अपनी फ़ज़ीयत करवाने में। पर इन सब के चक्कर में अगर कोई पिस रहा है तो वो दिल्ली है।  
अब आप अपने कानून मंत्री का ही मामला ले लो। आपका कानून मंत्री पिछले 3 महीने में 300 बार अपने बयान बदल चूका था। पूरी दिल्ली को पता चल गया था की वो आदमी फ़र्ज़ी है। खुद 2 महीने पहले विश्वविद्यालय ने न्यायालय में अपना जवाब देकर ये साफ़ कर दिया था की डिग्री फ़र्ज़ी है। आपने इस चक्कर में सौ झूठ बोले और पता नहीं कितने सम्मानित लोगों पर आरोप लगाये। पर जब न्यायालय का डंडा चला तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। 

ऐसा ही कुछ नगर निगम के मसले पर भी हुआ है। तीनों नगर निगमों का पैसा दिल्ली सरकार को ही देना था और आपने दिया भी। पर उससे पहले आपने सौ झूठ बोले ,कभी देश के प्रधानमंत्री, तो कभी उपराज्यपाल, तो कभी नगर निगमों को गाली दी। आखिरकार न्यायालय के डंडे के बाद आपको मज़बूरन ये पैसा देना ही पडा। क्यूंकि तब आपके पास कोई चारा नहीं बचा था। पर एक बड़ा सवाल ये है इन सबसे दिल्ली और दिल्ली वालों को क्या मिला? हमें अगर मिला तो कूड़े के ढेर और बदनामी। 
मेरी आप से हाथ जोड़ कर ये विनती है की अब देश आगे जाने को तैयार है, पूरी दुनिया भारत को एक नयी नज़र से देखने लगी है। ऐसे में देश की राजधानी में रोज़ का बवाल किसी भी तरीके से ठीक नहीं कहा जा सकता। इससे ना सिर्फ आपकी अपितु हमारी भी फ़ज़ीयत हो रही है। ट्रैन या हवाई सफर के दौरान दूसरे राज्य के लोग ताना देकर हमसे पूछते हैं की भाई ये क्या चुन लिया आपने दिल्ली में। इसलिए आप कृपया काम में ध्यान दे वरना आपकी इन हरकतों से दिल्ली बहुत पीछे निकल जायेगी। 

आपका शुभचिंतक  
गौरव जोशी , एक आम आदमी 

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

हम कुछ खोखले से लगने लगे हैं

आसाराम जी पर आरोपों की चर्चा चारों तरफ निकल पडी है, हर रोज़ नए आरोप और आरोपी बाहर आ रहे हैं या कहो की लाये जा रहे हैं। मैं उनका कोई समर्थक नहीं हूँ पर एक सवाल फिर भी उठाता हूँ। आसाराम जी पर पहले बलात्कार का आरोप लगा, उसकी जांच हुए और बलात्कार का आरोप सिद्ध नहीं हो सका। इसको लेकर भी मीडिया और समाज ने 10 दिन खूब चर्चा की। फिर आरोप लगाया गया यौनशौषण का। ये भी गंभीर आरोप है पर इसकी कोई ठीक ठीक से परिभाषा देश के किसी कानून में नहीं कही गई है। हम सबको जांच होने तक रुकना चाहिए था। मीडिया, FM और फिर सोशल मीडिया पर जो बवाल मचा की इसके घेरे में सब आ गए। खास तौर से इस देश के युवा वर्ग ने FM पर आसाराम जी पर घटिया बातों का खूब मजा लिया। अब अगर उन पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ तो उनकी सालों की कमाए इज्ज़त को कौन वापस करेगा। मीडिया से तो ख़ैर अब कोई उम्मीद बची ही नहीं है। 

और ऐसा कोई पहली बार हो रहा है ऐसा भी नहीं है। स्वामी नित्यानंद के खिलाफ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। सारे मीडिया ने वो नकली CD हजारों बार TV पर दिखाए। पर हुआ क्या, आज मीडिया वालों को माफ़ी मांगनी पढ रही है। और वो माफ़ी भी रात के 12 बजे , जब मीडिया वो अश्लील CD दिन में दिखा सकता है तो फिर माफ़ी रात को 12 बजे क्यों ? हम में से कोई इस पर सवाल नहीं करता , पर हम सब जब वो CD दिखाई जा रही थी तो उस साधू पर सवाल उठाने में सबसे आगे थे। ऐसा ही कुछ रामदेव जी के रामलीला प्रकरण में हुआ था। हमें जहाँ इतनी रात में सोते हुए लोगों पर हत्याचार पर सरकार से सवाल करने थे , हमने इसके उलट बाबा जी से सवाल करने शुरू कर दिए की वो वहां से महिलाओं के वस्त्र पहन कर क्यों भागे। तो क्या उन्हें मर जाना चाहिए था और ये लड़ाई जो बाबा जी ने शुरू की है बीच में ही रहने दें ? 

ऐसे ही बेकार के सवाल हमने साध्वी प्रज्ञा पर भी किये हैं। मीडिया ने ऐसे कहानी गडी की हम सब इसके झांसे में आ गए। हर चैनल अपनी नई कहानी बता रहा था। जयपुर में बैठक हुए और वहां से फिर कुछ लोग भोपाल निकल गए और वहां से उज्जैन में एक बैठक करके उन्होंने मक्का मस्जिद में इस्तेमाल किये जाने वाले विस्फोटक बनाने की योजना बनायी। अब जो लोग संघ को जानते हैं उन्हें पता है की संघ के बड़े लोग तो रोज़ बैठक करते हैं। ऐसे में तो मैं एक कहानी रोज़ लिख सकता हूँ। सच सिर्फ इतना था की जो मोटर साइकिल कभी साध्वी के पास हुआ करती थी वो उस विस्फोट वाले जगह पर मिल गयी। पर सवाल कहानी का नहीं परन्तु इस कहानी के माध्यम से भगवा को बदनाम करने का है और बदनाम करने की श्रंखला में हमारा भी जुड़ जाना है। जो खतरे की घंटी है। 

हम अगर साधू संतों पर लगे आरोपों पर इंतनी जल्दी अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और उन्हें बदनामी की काल कोठरी में डाल देना चाहते हैं , तो फिर आम आदमी के साथ हम कैसा सलूक करेंगे। और ऐसा ही अगर किसी दिन हमारे साथ हुआ तो? वो तो संत हैं उनमे अपार धेर्य है। अपने पर लगने वाले दाग को शायद धो भी लें, पर आम आदमी के लिए मरने से बेहतर कुछ नहीं होगा। 
ऐसे में कभी कभी ये एहसास होने लगता है की कहीं हमारे समाज की सोच समझ घास चरने तो नहीं चली गई है। ऐसे हरकतों से मुझे समाज खोखला सा लगने लगा है , ऐसा लगता है की जैसे हम सब तमाशबीन हैं बस। और हमें एक तमाशा देखने की जल्दी हैं चाहें इस तमाशा देखने में पुरे समाज का तमाशा ही क्यूँ न बन जाए। 

साधू संत समाज का आधार है , उन पर लगे आरोप पर हमें थोडा ठहरना चाहिए। अगर आरोप सिद्ध होते हैं तो हम सबको आगे आकर उन् पर अपने प्रतिक्रिया देने चाहिए। पर उससे पहले ऐसी कोई भी बात करना एक मुर्खता पूर्ण कार्य है क्यूंकि ऐसा करके हम अपने ही पैर पर कुल्हारी मार रहे हैं। 

गौरव जोशी 

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

बरखा दत्त को अब कैसे समझाएं ?

दिल्ली कि रैली में मोदी जी ने नवाज़ शरीफ और मनमोहन की मुलाक़ात पर एक बयान दे दिया। जिस पर बाद में एक बवाल मच गया। बयान था की पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने हमारे प्रधानमंत्री को एक देहाती महिला कहा। और वहां हिंदुस्तान के जो भी पत्रकार थे उन्हें इसका विरोध करना चाहिए था जो उन्होंने नहीं किया। मोदी जी ने भरी सभा में ऐसा कहने पर नवाज़ शरीफ को अपनी जुबान संभाल कर बात करने की हिदायत भी दे डाली। इसके बाद देश का हर नागरिक ये बात जानना चाहता था की वो पत्रकार आखिर थी कोन? पता चला की वो तो बरखा दत्त थीं। इस देश की जानी मानी पत्रकार और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की सबसे बड़ी मसीहा। अब देश गुस्से में था और बरखा दत्त पर भी दबाव था अपने सफाई देने का। तो बरखा ने ट्विट करके जो कहा उससे इस देश का पड़ा लिखा वर्ग सकते में है। बरखा मोदी जी की बात को काटेंगी ये तो देश का बच्चा बच्चा जानता है। क्यूंकि मोदी जी की रात दिन बुराई कर कर के ही बरखा जैसे पत्रकार इतने बड़े हुए हैं।




बरखा ने अपने ट्विट में कहा की शरीफ ने मुझे एक कहानी सुनायी थे जिसमे था गाँव में 2 लोग लड़ रहे हैं और जिसमे से एक देहाती महिला है जो सरपंच से उस व्यक्ति की शिकायत करने जाती है। अब कान को कहीं से भी घुमा के पकड़ लो। बात वोही है की नवाज़ को कहना ये था लो मनमोहन ने मेरी शिकायत अमेरिका के राष्ट्रपति से की है। अब मोदी जी की कही बात और बरखा की कहे बात में से एक ही बात सामने आती है। अब इसी में से 100 करोड़ का एक सवाल है जो आज कल हर किसी के मन में है की एक फालतू की कहानी सुनाने की बजाय बरखा ये भी बोल सकती थी की ऐसी कोई बात हुई ही नहीं। हाँ ये और बात है की पाकिस्तान का एक पत्रकार इस बात को पहले कह चूका था। तो भी क्या अगर बरखा मना कर भी देती तो हम पाकिस्तान की बात से ज्यादा बरखा पर यकींन करते। पर यहाँ बात कुछ और थी।



और वो बात है विश्वसनीयता की। आज जो विश्वसनीयता मोदी जी की है और जैसे पूरा देश उनकी बात पर यकींन कर रहा है वो अपने आप में एक मिसाल बन चूकी है। बरखा को ये पता था की मोदी जी की बात को काटना आज के हालात में खतरे की घंटी साबित हो सकती है। इससे उधेड़ बुन में बरखा ने ऐसा बयान दिया जो घुमाकर ही सही पर आकर उन पर ही आ पड़ा। और फिर शुरू से मोदी समर्थकों के निशाने पर रही बरखा की सोशल मीडिया पर जो छिछालेदर हुए है वो आज से पहले कभी देखने को नहीं मिली।

और फिर बरखा जैसे लोगों की छवि भी ऐसी है की जब पूरा देश पाकिस्तान के खिलाफ गुस्से में होता है तो इन जैसे पत्रकार दोस्ती की बातें कर रहे होते हैं। पर इससे बरखा को एक बात का अंदाज़ा हो गया होगा की अब समय बदल गया है। अब सिर्फ विरोध को ही विरोध करना है उसका ज़माना चला गया है। शायद उम्मीद भी करनी चाहिए की उनकी ऐसी हालत के बाद बाकि पत्रकार भी अब थोडा संभल कर कदम रखेंगे।   आपका अपना

गौरव जोशी