सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

हम कुछ खोखले से लगने लगे हैं

आसाराम जी पर आरोपों की चर्चा चारों तरफ निकल पडी है, हर रोज़ नए आरोप और आरोपी बाहर आ रहे हैं या कहो की लाये जा रहे हैं। मैं उनका कोई समर्थक नहीं हूँ पर एक सवाल फिर भी उठाता हूँ। आसाराम जी पर पहले बलात्कार का आरोप लगा, उसकी जांच हुए और बलात्कार का आरोप सिद्ध नहीं हो सका। इसको लेकर भी मीडिया और समाज ने 10 दिन खूब चर्चा की। फिर आरोप लगाया गया यौनशौषण का। ये भी गंभीर आरोप है पर इसकी कोई ठीक ठीक से परिभाषा देश के किसी कानून में नहीं कही गई है। हम सबको जांच होने तक रुकना चाहिए था। मीडिया, FM और फिर सोशल मीडिया पर जो बवाल मचा की इसके घेरे में सब आ गए। खास तौर से इस देश के युवा वर्ग ने FM पर आसाराम जी पर घटिया बातों का खूब मजा लिया। अब अगर उन पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ तो उनकी सालों की कमाए इज्ज़त को कौन वापस करेगा। मीडिया से तो ख़ैर अब कोई उम्मीद बची ही नहीं है। 

और ऐसा कोई पहली बार हो रहा है ऐसा भी नहीं है। स्वामी नित्यानंद के खिलाफ भी ऐसा ही कुछ हुआ था। सारे मीडिया ने वो नकली CD हजारों बार TV पर दिखाए। पर हुआ क्या, आज मीडिया वालों को माफ़ी मांगनी पढ रही है। और वो माफ़ी भी रात के 12 बजे , जब मीडिया वो अश्लील CD दिन में दिखा सकता है तो फिर माफ़ी रात को 12 बजे क्यों ? हम में से कोई इस पर सवाल नहीं करता , पर हम सब जब वो CD दिखाई जा रही थी तो उस साधू पर सवाल उठाने में सबसे आगे थे। ऐसा ही कुछ रामदेव जी के रामलीला प्रकरण में हुआ था। हमें जहाँ इतनी रात में सोते हुए लोगों पर हत्याचार पर सरकार से सवाल करने थे , हमने इसके उलट बाबा जी से सवाल करने शुरू कर दिए की वो वहां से महिलाओं के वस्त्र पहन कर क्यों भागे। तो क्या उन्हें मर जाना चाहिए था और ये लड़ाई जो बाबा जी ने शुरू की है बीच में ही रहने दें ? 

ऐसे ही बेकार के सवाल हमने साध्वी प्रज्ञा पर भी किये हैं। मीडिया ने ऐसे कहानी गडी की हम सब इसके झांसे में आ गए। हर चैनल अपनी नई कहानी बता रहा था। जयपुर में बैठक हुए और वहां से फिर कुछ लोग भोपाल निकल गए और वहां से उज्जैन में एक बैठक करके उन्होंने मक्का मस्जिद में इस्तेमाल किये जाने वाले विस्फोटक बनाने की योजना बनायी। अब जो लोग संघ को जानते हैं उन्हें पता है की संघ के बड़े लोग तो रोज़ बैठक करते हैं। ऐसे में तो मैं एक कहानी रोज़ लिख सकता हूँ। सच सिर्फ इतना था की जो मोटर साइकिल कभी साध्वी के पास हुआ करती थी वो उस विस्फोट वाले जगह पर मिल गयी। पर सवाल कहानी का नहीं परन्तु इस कहानी के माध्यम से भगवा को बदनाम करने का है और बदनाम करने की श्रंखला में हमारा भी जुड़ जाना है। जो खतरे की घंटी है। 

हम अगर साधू संतों पर लगे आरोपों पर इंतनी जल्दी अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और उन्हें बदनामी की काल कोठरी में डाल देना चाहते हैं , तो फिर आम आदमी के साथ हम कैसा सलूक करेंगे। और ऐसा ही अगर किसी दिन हमारे साथ हुआ तो? वो तो संत हैं उनमे अपार धेर्य है। अपने पर लगने वाले दाग को शायद धो भी लें, पर आम आदमी के लिए मरने से बेहतर कुछ नहीं होगा। 
ऐसे में कभी कभी ये एहसास होने लगता है की कहीं हमारे समाज की सोच समझ घास चरने तो नहीं चली गई है। ऐसे हरकतों से मुझे समाज खोखला सा लगने लगा है , ऐसा लगता है की जैसे हम सब तमाशबीन हैं बस। और हमें एक तमाशा देखने की जल्दी हैं चाहें इस तमाशा देखने में पुरे समाज का तमाशा ही क्यूँ न बन जाए। 

साधू संत समाज का आधार है , उन पर लगे आरोप पर हमें थोडा ठहरना चाहिए। अगर आरोप सिद्ध होते हैं तो हम सबको आगे आकर उन् पर अपने प्रतिक्रिया देने चाहिए। पर उससे पहले ऐसी कोई भी बात करना एक मुर्खता पूर्ण कार्य है क्यूंकि ऐसा करके हम अपने ही पैर पर कुल्हारी मार रहे हैं। 

गौरव जोशी 

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