आज कल देश में जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय का मुद्दा गरमाया हुआ है। 9 फरवरी की रात को जब टीवी पर मैंने देखा की देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में कुछ छात्र जो वामपंथ से ताल्लुक रखते हैं वो अफज़ल गुरु के नाम की तख्तियां शान से गले में डाल कर उसका शहादत दिवस मना रहे थे और पूरा देश ये तस्वीरें टीवी पर देख रहा था। सुबह होते होते उन् नारों का एक एक शब्द घर घर पहुँच गया था। और हर देश वासी की एक ही आवाज़ थी देश की राजधानी में और संसद से चंद किलोमीटर की दुरी पर संसद हमले के गुनहगार का महिमामंडन करने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। वैसे तो किसी आतंकवादी को बेकसूर बताने की कोशिश कोई नयी नहीं है पहले भी हमारे नेता और कुछ पत्रकार षड्यंत्र के तहत ऐसा करते रहे हैं। पर इस बार तसवीरें और वीडियो सब कुछ बोल रहा था। और फिर उस कार्यक्रम को आयोजित करने वाले लोग २ दिन तक खुद टीवी की बहस में आकर अपने किये को सही ठहराने में लगे थे और चीख चीख कर अफज़ल गुरु की फाँसी को न्यायिक हत्या बता रहे थे । देशभक्त होने के नाते सबका मन व्यथित था पर मन में एक सुकून था की इस बार पूरा देश खास तौर से इस देश का बुद्धिजीवी वर्ग एक साथ होगा क्यूंकि सारे सबूत सामने थे और गुनहगार खुद टीवी में बैठ कर इस बात को कबूल भी कर रहे थे । देश में उठी आवाज़ से सरकार को एक्शन में आना पड़ा और कनहैया को गिरफ्तार किया गया। 12 फरवरी तक सब वैसा ही चल रहा था जैसा किसी भी अच्छे और सभ्य देश में होना चाहिए। पर वामपंथी पत्रकारों बड़ी बेशर्मी के साथ देशद्रोही नारे लगाने वाले छात्रों का साथ दिया और वीडियो को झूठा बताया जबकि किसी कोर्ट ने उस वीडियो को नकली नहीं कहा है । और तो और अख़बारों में लेख लिखकर देशद्रोह और राजद्रोह को एक करके बताया गया जिससे आम जनता को ये मुद्दा सरकार के खिलाफ एक विद्रोह जैसा लगने लगे।
आम भारतीय आज इन अख़बारों के मालिकों और इन पत्रकारों के अहंकार से डर रहा है। आखिर जब पूरा देश एक आवाज़ से देशद्रोही नारे लगाने वालों को सजा की मांग कर रहा था तब भी इनमे इतनी हिम्मत कहाँ से आ गयी की ये लोग उनके समर्थन में खड़े हो गए। ऐसे तो एक दिन ऐसा नारा भी लग सकता है कि "कसाब हम शर्मिंदा हैं तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं" आखिर 26/11 के हमले को भी तो कुछ लोगों ने आरएसएस की तरफ मोड़ने की कोशिश की थी। कुछ साल इसी बात को ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते रहने से ऐसा हो सकता है की हम ये मान भी लें की शायद कसाब निर्दोष था। ऐसा ही बटला काण्ड में भी हुआ था जब इन्ही बुद्धिजीवियों ने ये भ्रम फैलाने की कोशिश की थी की शायद शहीद इंस्पेक्टर शर्मा को गोली पीछे से चली थी मतलब ये की किसी पुलिस वाले ने ही उनको गोली मार दी। ऐसे उदाहरण ना जाने कितने हैं। .याकूब मेमन के लिए तो आधी रात को कोर्ट के दरवाज़े तक खटखटाये गए थे। ये वो ही लोग हैं जो नक्सलवादियों का खुले आम समर्थन करते हैं और उनके हथियार उठाने को सही ठहराते है और उनके बचाव में ये तर्क देते हैं की वहां हमारे अर्धसैनिक बलों के जवान महिलाओं और बच्चों पर जुल्म कर रहे हैं।
आप खुद सोचिये की कुछ आतंकवादियों के पक्ष में देश के इतने बड़े बड़े वकील कैसे खड़े हो जाते है ? इस देश का बड़े से बड़ा आदमी अपने किसी केस की एक पेशी के लिए भी इन् वकीलों को बुलाने की हिम्मत नहीं जुटा सकता। उनकी जितनी एक पेशी की फीस है उतना तो एक आम आदमी पुरे साल में भी नहीं कमाता होगा।
बड़ा सवाल ये है कि ये लोग कौन हैं जो देश की आवाज़ के खिलाफ बिना डरे चल रहे हैं, आखिर कौन सी वो ताकतें हैं जो इनका समर्थन कर रही है। आज जब पूरा विश्व आतंकवाद के खिलाफ एक हो रहा है, जब खुद मुसलमानो का एक बड़ा वर्ग जिसमे खासतौर से भारतीय मुस्लमान इस आतंकवाद के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं ऐसे वक़्त में इन लोगों की ये हरकतें आतंकवादियों के हौसले बुलंद कर रही है और इस से देश की सुरक्षा भी खतरे में पड़ रही है। आम जनमानस को ये आवाज़ उठानी होगी और सरकार से जांच की मांग करनी होगी जिससे ये पता लगे की ऐसे लोगों के असली मददगार कौन हैं जिनकी शह पर ये लोग देश के खिलाफ जाने से भी नहीं डरते।
एक आम भारतीय होने के नाते मुझे भी डर लग रहा है। क्यूंकि कोई देश तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक आतंकवाद जैसे विषय पर भी वो एक राय ना बना सके। और जब तक ये लोग हैं ऐसा कभी संभव नहीं हो सकता। क्यूंकि ये लोग किसी आतंकवादी हमले के बाद २ दिन तक तो आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ते दिखते हैं और फिर यही पत्रकार जेल के बाहर उस आतंकवादी का साक्षात्कार लेने के लिए लाइन लगा कर खड़े हो जाते हैं और तो और कुछ तो उसके घर पर जाकर उसकी गरीबी पर लम्बे चौड़े भाषण देने लग जाते हैं और फिर बड़े बड़े वकील उसके केस लड़ने चले आते हैं । अगर हमें ये देश बचाना है तो इन लोगों के खिलाफ देश को सड़कों पर आना होगा नहीं तो ये अजीब सा डर हमारे अंदर गहरा होता चला जाएगा और इसका फायदा देश के दुश्मन उठाएंगे और फिर वही होगा जो हमें इतने सालों में आतंकवादी हमलों में झेला है। वैसे भी जो देश आतंकवाद जैसे मुद्दों पर एक नहीं हो सकता उसके लोग सिर्फ अपने अस्तित्व के लिए लड़ते रहते हैं। एक तरफ हमारे देश के प्रधानमंत्री दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ माहोल बनाने में लगे हैं और दूसरी तरफ हमारे देश में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी कुछ आतंकवादियों को हीरो बनाने में लगे हैं। सोचिये ऐसी हरकत करके ये लोग ना सिर्फ हमारे प्रधानमंत्री को बल्कि पुरे देश को दुनिया में हँसी का पात्र बना रहे हैं। और अगर ये ऐसा ही चलता रहा तो देश को महाशक्ति बनाना सपना ही रह जाएगा।
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